द्वि-जगत वर्गीकरण प्रणाली की कमियां/सीमाएं क्या हैं?

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(D) वर्गीकरण की द्वि-जगत प्रणाली को लंबे समय तक स्वीकार किया गया था,लेकिन इसकी कई सीमाएं थीं:
$(i)$ यह प्रोकैरियोट्स (जैसे बैक्टीरिया) और यूकेरियोट्स के बीच अंतर करने में विफल रही।
$(ii)$ यह एककोशिकीय और बहुकोशिकीय जीवों के बीच अंतर नहीं कर पाई।
$(iii)$ यह प्रकाश संश्लेषक (शैवाल) और गैर-प्रकाश संश्लेषक (कवक) जीवों के बीच अंतर करने में विफल रही।
$(iv)$ कवक की कोशिका भित्ति काइटिन से बनी होती है,जो पौधों की सेल्युलोसिक कोशिका भित्ति से रासायनिक रूप से भिन्न होती है।
$(v)$ यूग्लीना जैसे जीवों में पौधों (प्रकाश संश्लेषक) और जानवरों (परपोषी) दोनों जैसे लक्षण होते हैं,जिससे उनका वर्गीकरण कठिन हो गया।
$(vi)$ लाइकेन,जो शैवाल और कवक का सहजीवी संबंध है,को किसी भी जगत में नहीं रखा जा सका।
$(vii)$ वायरस,जिनमें कोशिकीय तंत्र और जीवद्रव्य का अभाव होता है,इस प्रणाली में फिट नहीं बैठते क्योंकि वे न तो पूरी तरह से जीवित हैं और न ही निर्जीव।

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चर्चा कीजिए कि समय के साथ वर्गीकरण प्रणालियों में कई बदलाव कैसे आए हैं।

कथन $S$: वूज़ द्वारा प्रस्तावित वर्गीकरण पद्धति को त्रि-डोमेन (three-domain) प्रणाली कहा जाता है। कारण $R$: वूज़ ने जीवों को तीन डोमेन में विभाजित किया है: आर्किया (Archaea),बैक्टीरिया (Bacteria) और यूकेरिया (Eukarya)।

आर.एच. व्हिटेकर द्वारा प्रस्तावित पाँच जगत वर्गीकरण का संक्षिप्त विवरण दीजिए।

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